
रामनाथ रावत
सीतापुर। होनहार विरवान के होत चीकने पात… यह कहावत जनपद सीतापुर के उभरते हुए सामाजिक और आध्यात्मिक स्तंभ साकेत मिश्रा (साकेत शंकर) पर सटीक बैठती है।
जनपद के गौरव और अवधी व हिंदी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’ जी के सुपुत्र साकेत मिश्रा आज किसी औपचारिक परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपनी तेजतर्रार कार्यशैली, निष्पक्ष सोच और निर्भीक व्यक्तित्व के दम पर न केवल युवाओं के दिलों में जगह बनाई है, बल्कि समाज के हर वर्ग में एक विशिष्ट और सम्मानित पहचान स्थापित की है।
साकेत मिश्रा के जीवन का मुख्य ध्येय हमेशा से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का कल्याण करना रहा है। वे पीड़ित, शोषित और वंचित समाज की आवाज़ बनकर उभरे हैं। विपरीत परिस्थितियां भी उनके फौलादी इरादों को डिगा नहीं पाईं। मुश्किलों के आगे घुटने टेकने के बजाय, संघर्षों से सीधे लोहा लेने की उनकी जीवंत प्रवृत्ति उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है।
क्षेत्र का कोई भी गरीब या बेसहारा व्यक्ति जब अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचता है, तो वे उसकी निःस्वार्थ सेवा के लिए सदैव तत्पर नजर आते हैं। साकेत मिश्रा का व्यक्तित्व केवल सामाजिक कार्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक जगत में भी उनका कद बेहद ऊंचा है।
वे लंबे समय से पावन और पौराणिक 84 कोस की तपोभूमि नैमिषारण्य स्थित ‘तुलसीपीठ’ के पीठाधीश्वर के रूप में अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं। इस गरिमामयी पद पर मनोनीत होने के बाद से संपूर्ण आध्यात्मिक जगत और संत समाज में उन्हें ‘साकेत शंकर’ के पावन नाम से ख्याति प्राप्त हुई है।
पिता डॉ. श्याम सुंदर मिश्र ‘मधुप’ जी से विरासत में मिले उच्च साहित्यिक व नैतिक संस्कारों और अपनी खुद की आध्यात्मिक व सामाजिक निष्ठा की बदौलत साकेत मिश्रा आज के युवाओं के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं।
वे परंपरा और आधुनिक प्रगतिशीलता के अनूठे संगम हैं। आज पूरा जनपद उनके सेवा भाव, निर्भीकता और समर्पण को सलाम कर रहा है, और वे समाज की बेहतरी के लिए निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।





