
लखनऊ। पूज्य उपाध्याय श्री 1008 विहसंत सागर जी महाराज के पावन वर्षायोग (चातुर्मास) के अंतर्गत आयोजित बाल संस्कार शिविर में तीन वर्ष से लेकर तीस वर्ष तक के बच्चों, किशोरों एवं युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
शिविर का उद्देश्य बच्चों एवं युवाओं में धार्मिक संस्कार, नैतिक मूल्यों एवं आध्यात्मिक चेतना का विकास करना रहा।

इस अवसर पर पूज्य उपाध्याय श्री 1008 विहसंत सागर जी महाराज ने बच्चों को अष्टद्रव्य पूजा का आध्यात्मिक महत्व समझाते हुए बताया कि भगवान की पूजा-अर्चना में जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप एवं फल इन आठ द्रव्यों का विशेष महत्व है। उन्होंने प्रत्येक द्रव्य का आध्यात्मिक अर्थ सरल एवं प्रेरणादायक ढंग से समझाया और बताया कि इन द्रव्यों के माध्यम से श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के भाव से भगवान की आराधना की जाती है।
अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में गुरुदेव ने बच्चों एवं युवाओं को प्रतिदिन मंदिर आने, नित्य नियम से पूजा-अर्चना करने तथा मोबाइल की अनावश्यक लत से दूर रहने की सीख दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कैसी भी परिस्थितियाँ आएँ, अपने भगवान, अपने इष्ट और अपने गुरु की आराधना कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अधिकांश लोग दुःख आने पर भगवान को याद करते हैं, लेकिन जो व्यक्ति सुख के समय भी भगवान का निरंतर स्मरण करता है, भगवान भी कठिन समय में उसका मार्गदर्शन और संरक्षण करते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 10 से 20 मिनट अपने आराध्य की पूजा, ध्यान एवं भक्ति के लिए अवश्य निकालने चाहिए। इससे मन एकाग्र रहता है, पढ़ाई में रुचि बढ़ती है, अच्छे संस्कार विकसित होते हैं तथा जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है।
कार्यक्रम के अंत में सभी बच्चों एवं युवाओं ने संकल्प लिया कि वे नियमित रूप से मंदिर आएंगे, भगवान की पूजा-अर्चना करेंगे, अपने गुरुजनों के बताए मार्ग पर चलेंगे तथा मोबाइल के अनावश्यक उपयोग से बचते हुए अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में अपनाएंगे।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से चंद्रप्रकाश जैन एवं अजय जैन ने बाल संस्कार शिविर में प्रतिभाग करने वाले बच्चों को पुरस्कार वितरित किए।
मीडिया प्रभारी सिद्धार्थ जैन ने बताया कि 28 जुलाई को पूज्य गुरुदेव के वर्षायोग कलश की स्थापना मंत्रोच्चार के साथ मंदिर जी में संपन्न होगी। इसके पूर्व वास्तु विधान का आयोजन किया जाएगा, जिसमें समस्त देवी-देवताओं का आवाहन एवं पूजन कर आगामी सभी धार्मिक कार्यक्रमों के निर्विघ्न एवं मंगलमय संपन्न होने की कामना की जाएगी।
उन्होंने बताया कि 30 जुलाई से जैन धर्म के महान स्तोत्र भक्तामर स्तोत्र का प्रतिदिन व्याख्यान प्रारंभ होगा। इस विशेष श्रृंखला में 48 दिनों तक भक्तामर स्तोत्र की 48 गाथाओं का क्रमवार अध्ययन, विस्तृत व्याख्या, समीक्षा एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया जाएगा।





