सांस फूलने, थकान या सीने में दर्द जैसे लक्षण पल्मोनरी हाइपरटेंशन का प्रथम संकेत

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता देर से चलने पर हार्ट लंग ट्रांसप्लांट ही है अंतिम उपचार

लखनऊ। सांस फूलने और थकान जैसे शुरुआती लक्षण को नजर अंदाज करना गंभीर बीमारी की दावत देना जैसा हैं। यह बीमारी पल्मोनरी हाइपरटेंशन का प्रथम संकेत हो सकता है। बीमारी की जल्द पहचान से समय रहते इलाज समय सम्भव है। इसका पता देर से चलने पर हार्ट लंग ट्रांसप्लांट अंतिम उपचार है।

पल्मोनरी एण्ड क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश ने बताया की बीमारी का पता देर से चलने पर उसका 3 साल जीवित रहने की सम्भावना करीब 55 प्रतिशत रहती है।  लक्षण शुरू होने और बीमारी का पता चलने के बीच औसतन 1.5–2 साल की देरी होती है, जिसका मुख्य कारण यह है कि सांस फूलने और थकान जैसे शुरुआती लक्षण नजर अंदाज कर दिये जाते हैं।

जिन मरीज़ों की बीमारी बढ़ चुकी है और मेडिकल थेरेपी से ठीक नहीं हो रही है, उनके लिए लंग ट्रांसप्लांटेशन या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांटेशन ही पक्का इलाज का विकल्प है।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन एक ऐसी स्थिति है जो फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती है और तब होती है जब फेफड़ों में रक्तचाप सामान्य से अधिक हो जाता है। इसलिए, हृदय को फेफड़ों में रक्त पंप करने के लिए अधिक प्रयास करना पड़ता है। सांस फूलना, चक्कर आना और सीने में दर्द कुछ ऐसे लक्षण हैं जो हृदय पर इस बढ़े हुए दबाव के कारण हो सकते हैं।

पल्मोनरी हाइपरटेंशन के कारण

पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) का सटीक कारण ज्ञात नहीं है, लेकिन यह कुछ ऐसी चिकित्सीय स्थितियों के कारण हो सकता है जो फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं, अवरुद्ध करती हैं या प्रभावित करती हैं। इससे पल्मोनरी धमनियों में उच्च रक्तचाप हो जाता है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैः-
 बाईं ओर की हृदय रोग
 फेफड़ों की बीमारियां और ऑक्सीजन का कम स्तर
 फेफड़ों में रक्त के थक्के
पल्मोनरी हाइपरटेंशन के लक्षण
• सूखी खांसी या खांसी के साथ खून आना
• सीने में दर्द
• कमज़ोरी
• जी मिचलाना और उल्टी होना
• पेट, पैरों या पंजों में सूजन
• सांस फूलना
• चक्कर आना, जिससे बेहोशी भी हो सकती है
• साइनोसिस (होंठ और त्वचा का रंग नीला पड़ना)
• थकान

पल्मोनरी हाइपरटेंशन के जोखिम कारक

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का जल्द पता लगाने और इसकी रोकथाम के लिए जोखिम कारकों को जानना ज़रूरी है। जिन लोगों में इनमें से एक या ज़्यादा जोखिम कारक हैं, उन्हें अपनी सेहत पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए। अगर उन्हें बिना किसी साफ़ वजह के सांस फूलने, थकान या सीने में दर्द जैसे लक्षण महसूस हों, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। इन जोखिम कारकों में शामिल हैं:
उम्र: पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसका पता अक्सर 30 से 60 साल की उम्र के बीच चलता है। उम्र बढ़ने के साथ दिल और रक्त वाहिकाओं में बदलाव के कारण इसका जोखिम बढ़ जाता है। जीवनशैली की आदतें: धूम्रपान और गैर-कानूनी नशीली दवाओं के इस्तेमाल से दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे सूजन हो सकती है और फेफड़ों में दबाव बढ़ सकता है।

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता लगाना

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण दिल या फेफड़ों की दूसरी बीमारियों जैसे ही होते हैं। पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता लगाने के लिए नीचे दिए गए तरीके अपनाए जाते हैं:
 मरीज़ की मेडिकल हिस्ट्री
 शारीरिक जांच
 शुरुआती नॉन-इनवेसिव टेस्टः-
• ब्लड टेस्ट (दूसरी वजहों का पता लगाने के लिए)
• इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG या EKG)
• चेस्ट X-रे
 मुख्य स्क्रीनिंग टेस्ट
• ट्रांसथोरेसिक इकोकार्डियोग्राफी
 अतिरिक्त डायग्नोस्टिक टेस्ट
• लंग फंक्शन टेस्ट (फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच)
• स्लीप स्टडी (नींद की जांच)
• एक्सरसाइज टेस्ट
 एडवांस्ड इमेजिंग
• कंप्यूटेड टोमोग्राफी (CT) स्कैन
• कार्डियोवैस्कुलर मैग्नेटिक रेजोनेंस (CMR)
• वेंटिलेशन/परफ्यूजन (V/Q) स्कैन
 पुष्टि करने वाला टेस्ट
• राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन
 खास टेस्ट (ज़रूरत पड़ने पर)
• जेनेटिक टेस्टिंग
• लंग बायोप्सी

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का इलाज

हालांकि पल्मोनरी हाइपरटेंशन को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन इलाज से इसके लक्षणों को कम करने और स्थिति को बेहतर ढंग से संभालने में मदद मिल सकती है। पल्मोनरी हाइपरटेंशन के इलाज के विकल्प इस प्रकार हैं:
 PH का बिना दवा वाला इलाज
• खान-पान में बदलाव
• जीवनशैली में बदलाव
• ऑक्सीजन थेरेपी
 PH का दवा से इलाज
टारगेटेड थेरेपी: एंडोथेलिन रिसेप्टर एंटागोनिस्ट, फॉस्फोडिएस्टरेज़ टाइप-5 इनहिबिटर, प्रोस्टासाइक्लिन एनालॉग और रिसेप्टर एगोनिस्ट और सॉल्युबल गुआनिलेट साइक्लेज स्टिमुलेटर
• कैल्शियम चैनल ब्लॉकर
• डाययुरेटिक्स
• एंटीकोआगुलंट्स
 PH का सर्जिकल इलाज
• पल्मोनरी एंडार्टरेक्टॉमी
• बलून एंजियोप्लास्टी
• बलून एट्रियल सेप्टोस्टॉमी
• फेफड़े का प्रत्यारोपण (लंग ट्रांसप्लांटेशन)

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