
लखनऊ। बाल्यावस्था में बच्चों का मन नाजुक होता है। उन्हें मजबूत आत्म बल प्रदान करने के लिए स्वदेशी आहार का उपयोग करना बेहद आवश्यक है। आशियाना जैन मंदिर में बच्चों की संस्कार शिविर संबोधित करते हुए पूज्य उपाध्याय श्री 1008 विहसंत सागर जी महाराज ने कहा की विदेशी फल, डिब्बा बंद वस्तुएं समेत अनजान खाद्य पदार्थ खाना बच्चों के लिए बेहद हानिकारक है।

बच्चों को व्यसन और विदेशी वस्तुओं के मोह से दूर रखें
उपाध्याय श्री ने कहा की बच्चे हमारे देश और समाज का भविष्य हैं। आज हम उन्हें जिस प्रकार के संस्कार, आदतें और विचार देंगे, उसी के आधार पर उनका आने वाला जीवन निर्धारित होगा। इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों को नशे, व्यसन और बुरी संगति से बचाएँ तथा उन्हें स्वस्थ, अनुशासित और संस्कारवान जीवन जीने के लिए प्रेरित करें।
बच्चों को समझाएँ कि किसी भी प्रकार का नशा या व्यसन कुछ समय के आकर्षण के बाद जीवन, स्वास्थ्य, पढ़ाई और परिवार सभी को नुकसान पहुँचा सकता है। उन्हें खेलकूद, योग, पुस्तक-पठन, रचनात्मक कार्यों और अच्छे मित्रों के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें।
माता-पिता और शिक्षक बच्चों से खुलकर बातचीत करें, उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें डाँटने के बजाय प्रेम एवं समझदारी से सही मार्ग दिखाएँ।
इसी प्रकार, बच्चों में विदेशी वस्तुओं के प्रति अनावश्यक आकर्षण कम करना भी आवश्यक है। उन्हें अपने देश में बने सामान, स्थानीय कारीगरों और स्वदेशी उत्पादों के महत्व के बारे में जानकारी दें।
उन्हें यह समझाएँ कि किसी वस्तु की गुणवत्ता केवल उसके विदेशी होने से तय नहीं होती। स्थानीय उत्पादों को अपनाने से हमारे कारीगरों, छोटे व्यापारियों और देश की अर्थव्यवस्था को भी सहयोग मिलता है।
हम बच्चों को ऐसा वातावरण दें जहाँ वे अपनी संस्कृति, परंपराओं और देश की उपलब्धियों पर गर्व करना सीखें, लेकिन साथ ही दुनिया की अच्छी चीजों को समझने और विवेकपूर्ण ढंग से अपनाने की सोच भी विकसित करें।
आइए, मिलकर ऐसा बचपन दें जो नशे से मुक्त हो, बुरी आदतों से दूर हो, संस्कारों से समृद्ध हो और अपने देश के प्रति जिम्मेदारी एवं सम्मान की भावना से भरा हो। स्वस्थ बच्चे, संस्कारवान बच्चे और जागरूक बच्चे ही मजबूत समाज और उज्ज्वल राष्ट्र का निर्माण करते हैं।




