आत्मा की शुचिता, स्वच्छता और निर्मलता का होना ही शौच धर्म है-उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज

दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को उत्तम शौच धर्म की पूजा-अर्चना शहर के

लखनऊ। दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को उत्तम शौच धर्म की पूजा-अर्चना शहर के विभिन्न जैन मंदिरों में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की गई। जैन श्रद्धालुओं ने विधि-विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ भगवान की पूजा कर उत्तम शौच धर्म को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

आशियाना जैन मंदिर में पूज्य उपाध्याय श्री 108 विहसंत सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए उत्तम शौच धर्म का आध्यात्मिक महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि आत्मा की शुचिता, स्वच्छता और निर्मलता का होना ही शौच धर्म है। लोभ का अभाव होना और आत्मा में शुद्ध भावों का प्रकट होना ही वास्तविक शौच धर्म है। उन्होंने श्रद्धालुओं को लोभ का त्याग कर आत्मा की शुद्धता और निर्मलता की ओर बढ़ने का संदेश दिया।

महाराज श्री ने कहा कि बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ मन और भावों की स्वच्छता भी आवश्यक है। जब मन से लोभ, विकार और अशुद्ध भाव दूर होते हैं, तभी आत्मा की वास्तविक शुद्धता प्रकट होती है। दशलक्षण धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अपने व्यवहार और जीवन में उतारना ही इसका वास्तविक उद्देश्य है।

वहीं बच्चों के शिविर में भी दशलक्षण धर्म को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। शिविर में मौजूद सभी बच्चों ने हाथ उठाकर अपने जीवन में दशलक्षण धर्म के सिद्धांतों को अपनाने का नियम लिया। बच्चों ने घमंड, लोभ, असत्य तथा क्षमा के अभाव जैसे भावों से दूर रहने और अपने आचरण को शुद्ध रखने का संकल्प लिया।

इस अवसर पर बच्चों को बताया गया कि इन नियमों का पालन तभी संभव है, जब वे प्रतिदिन गुरु की शरण में आकर उनके उपदेशों को सुनें और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। गुरु के मार्गदर्शन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार, संयम और धार्मिक भावना का विकास होता है।

मीडिया प्रभारी सिद्धार्थ जैन ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन रविवार को सभी जैन मंदिरों में प्रातः 7 बजे उत्तम सत्य धर्म की पूजा-अर्चना श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की जाएगी।

Rajeev Jain

rajeevcrime@gmail.com
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