अंर्तराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में द लेसन का नाट्य मंचन

नाटक के मंचन से पूर्व उदघाटन एवं दीप प्रज्जवलन डा० अनिल रस्तोगी के अतिरिक्त डा० संजय मेहरोत्रा एवं डा० चंदना मेहरोत्रा द्वारा किया ग

लखनऊ। अंर्तराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, गोमती नगर में द लेसन का नाट्य मंचन निर्देशन नगर के प्रतिष्ठित नाट्य निर्देशक तुषार बाजपेयी के कुशल निर्देशन में मंचित किया गया।

नाटक के मंचन से पूर्व उदघाटन एवं दीप प्रज्जवलन डा० अनिल रस्तोगी के अतिरिक्त डा० संजय मेहरोत्रा एवं डा० चंदना मेहरोत्रा द्वारा किया गया उक्त अवसर पर डा० अनिल रस्तोगी ने समस्त कलाकारों को आशीर्वाद प्रदान किया। नाटक के कथानक के अनुसार द लेसन एक एकांकी नाटक है। कहानी एक प्रोफेसर, एक छात्रा और एक नौकरानी के इर्द-गिर्द घूमती है। एक दिन 18 साल की एक छात्रा पढ़ाई करने के लिए प्रोफेसर के घर आती है। वह डॉक्टरेट की परीक्षा की तैयारी कर रही होती है।

छात्रा की हत्या

शुरूआत में छात्रा बहुत उत्साहित आत्मविश्वासी और बातूनी होती है। दूसरी ओर प्रोफेसर शांत और विनम्र दिखाई देता है। प्रोफेसर उसे गणित पढ़ाना शुरू करता है। पहले सवाल आसान होते हैं, जिनका छात्रा सही जवाब दे देती है। लेकिन धीरे-धीरे प्रोफेसर कठिन और अजीब सवाल पूछने लगता है। छात्रा उनसे उलझ जाती है और गलतियाँ करने लगती है। इसके बाद प्रोफेसर भाषा और शब्दों (फिलोलॉजी) का पाठ पढ़ाने लगता है।

वह लगातार बोलता रहता है और ऐसे-ऐसे तर्क देता है जिनका कोई स्पष्ट अर्थ नहीं होता। छात्रा उसकी बातें समझ नहीं पाती। वह थकने लगती है और उसके दाँत में दर्द भी होने लगता है। जैसे-जैसे पाठ आगे बढ़ता है, प्रोफेसर का व्यवहार बदलने लगता है। वह गुस्सैल, कठोर और डरावना हो जाता है। छात्रा कमजोरऔर डरी हुई महसूस करने लगती है। नौकरानी कई बार प्रोफेसर को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन वह नहीं मानता।

अंत में प्रोफेसर अपना आपा खो देता है और छात्रा की हत्या कर देता है। हत्या के बाद नौकरानी बताती है कि प्रोफेसर पहले भी बहुत-सी छात्राओं की हत्या कर चुका है। लेकिन उसे कोई पछतावा नहीं होता। थोड़ी देर बाद एक नई छात्रा पढ़ने के लिए आ जाती है और नाटक वहीं समाप्त हो जाता है।

नाटक में प्रोफेसर की भूमिका में केशव पंडित, मेड की भूमिका में मृदुला भारद्वाज एवं छात्रा की भूमिका ने मिन्नी दीक्षित द्वारा मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया नाटक का सेट डिजाइनिंग तुषार बाजपेयी का था सेट निर्माण राम प्रकाश का था प्रकाश परिकल्पना विकास दुबे का था संगीत संचालन अंकुर सक्सेना का था। मंच प्रबन्धक अहमद रजा खान का था।

उदघोसक प्रभात कुमार बोस, उ०प्र० संगीत नाटक अकादमी का था निर्माण सहयोग भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं श्रद्धा मानव सेवा कल्याण समिति का था प्रस्तुति आकांक्षा थियेटर आर्टस का था। सम्पूर्ण परिकल्पना एवं निर्देशन तुषार वाजपेयी का था कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस नाटक में रंग दर्शकों के समक्ष अत्यधिक प्रभाव डाला।

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