
लखनऊ। उपाध्याय श्री विहसंत सागर जी महाराज ने चौक दिगंबर जैन मंदिर से प्रातः साढ़े सात बजे पदयात्रा करते हुए सआदतगंज दिगंबर जैन मंदिर के लिए प्रस्थान किया। जहा आशियाना जैन मंदिर में पंचकल्याणक के पहले विराजमान होने वाली प्रतिमा का भक्ति भाव से अर्चना की और महाराज श्री के सानिध्य में सुख और मंगल कामना के लिए आशीर्वाद मांगा।
सआदतगंज दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य उपाध्याय श्री विहेसंत सागर जी महाराज ने कहा कि “तकनीकी ओटीपी तो बस कुछ पलों का काम करता है, मगर धर्म का ओटीपी जीवन ही बदल देता है। सफलता की चमक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण धर्म का नूर है। यही वह द्वार है, जिससे मनुष्य का जीवन सार्थक बनता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य को धर्म का सही मार्ग मिलता है, तब उसे अपने कर्मों का लेखा-जोखा समझ में आने लगता है। उसे ज्ञात होने लगता है कि कौन से कर्म उसे आगे बढ़ा रहे हैं और कौन से कर्म बंधन का कारण बन रहे हैं। धर्म आत्म-जागरण का वह ओटीपी है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप की पहचान कराता है। जो व्यक्ति समय रहते धर्म को अपना लेता है, वह अपने जीवन की दिशा बदल देता है और केवल सफलता ही नहीं, बल्कि सार्थकता की ओर भी आगे बढ़ता है।
शाम को भक्ति अर्चना के दौरान महाराज श्री ने कहा कि जो भी भगवान का माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करता है उसका पूरा जीवन अनंत काल तक सुख में हो जाता है। उसे ऐसी भक्ति प्राप्त होती हैं। जो सीधे अनंत परमात्मा से जोड़ देता है। यही नहीं भगवान के पंचकल्याणक के दौरान जो भी श्रावक जन इसमें सम्मिलित होता है उसे भी भगवान के समीप होने का सौभाग्य मिलता है और उनका भी भाग्य बहुत सुखमय हो जाता है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने पूज्य गुरुदेव के प्रवचनों का लाभ लिया।





